सोमवार, 25 जनवरी 2016

एक ही बात...


एक ही बात
नीली स्याही से लिखो तो कुछ और
काली से लिखो तो कुछ और 
लाल, हरी, गुलाबी से लिखने पर
चटख जरूर हो जाती है
लेकिन
हर बार एक नए भाव में खिलखिलाती है
एक ही बात
किसी उजले काग़ज में,
डायरी के पन्ने में,
पीले से अख़बार में,
या मुड़े तुड़े टिशु पेपर में भी लिखी जाती है
लेकिन
हर बार एक नयी रंगत लेकर आती है
एक ही विचार को अलग तरह से गुनगुनाती है
एक ही बात
किसी की हथेली में,
धूसर से ब्लैकबोर्ड में,
पुराने किले की दीवार में,
सूख रहे कांक्रीट पर,
या समंदर की रेत पर
लिखे के निशान छोड़ जाती है
हर बार
एक ही बात...
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चिन्मय

शनिवार, 29 अगस्त 2015

बेदर्द सही...


बेदर्द सही
खुदगर्ज़ सही
बेपरवाह सही
कमबख्त सही

...एकदम सही कहती हो तुम और मुझे मानने में ऐतराज़ भी नहीं. मेरा ये कुबूलना तुम्हारे ख्याल से बीच का रास्ता है. लेकिन तुम तो जानती हो की मुझे रिश्तों में पैबंद लगाने नहीं आते. भावनाओं का बोझा उठाने में पीठ कांपती है.

तेरी हंसी से मुझे मीठी सी झुरझुरी होती है और ये कई दिनों तक लगातार चलती रहती है. कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है की अरसा हो गया तुम्हे हँसे हुए. मुझे उस मीठी सी झुरझुरी की बहुत जरुरत है...

सैकड़ो सूरज जब साथ चमकते है
तेरी आँखों में सैलाब उमड़ता है...

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              चिन्मय