Wednesday, May 30, 2007

गुमनाम सफ़र.....


गुमनाम सफ़र.....

गुमनाम शहर से आया हू
गुमनाम सफ़र को जाओूंगा
बेसुध सी मेरी हस्ती है
गुमनामी मे खो जाओूंगा

दरिया ने किनारे छोड़ दिए
कुछ डूब गये, कुछ पार भए
ह्म नीद मे खोए कुछ ऐसे
ना डूब सके ना पार भए

गुमनाम बसेरा हो मेरा
गुमनाम सी मेरी रंगत हो
रास फकीरी आ जाए
गुमनामी की ही संगत हो

कोई छिपा है आँधियारे मे
दुनिया के कोने-कोने मे
चुपचाप निकल या कर मातम
मेरे बुल्ले शाह के डेरे मे

कौन सी बस का टिकिट करू
गुमनाम शहर को जाना है
खोटे पैसे छोड़ दिए
असली पैसे ले जाना है



chinmay
04/1/07 justju/rose.gif

मन को आराम नही......


शायद अब किसी को मुझसे कोई काम नही
फिर भी मन को पल भर भी आराम नही

पत्थरो को चुनने मे ज़िंदगी बीती
किसी खंडहार मे भी मेरा नाम नही

पन्छियो के पर गिनना आदत नही मेरी
यहा हँसते हुए बुत का भी कोई दाम नही

निशिचंत हू वैसे ही जैसे ओस की बूँद
समुंदर होने का मुझे गुमान नही

चटकी क़ब्रों से आता शोर सुनता हूँ रोज़
चौराहे मे गड़ी सूलियों का कोई मुकाम नही

करता हू खंज़र से मेरे आज़ा के टुकड़े
कुत्तो की भूख का कोई अंजाम नही

बदलते दौर मे बदलना है सबको
बदल कर ये ना कहूँगा की मैं इंसान नही

chinmay
28/02/07 justju/rose.gif

Monday, May 28, 2007

कही और जाना था......


कही और जाना था......


राह मे चलते-चलते भटक जाता हू
कही और जाना था, कही और िनकल जाता हू

पता पूछना िकसी से मुनािसब ना समझा
मुकाम क्या है, इसी मे उलझ जाता हू

इक सूरत मेले मे िदखी थी पह्चानी सी
देखते ही मे धुन्ध मे िमल जाता हू

तस्वीरो मे उसका चेह्रा मासूम सा लगता है
पहचान नही पाता, इसिलये भूल जाता हू

िदन तो याद नही दुपट्टे का रन्ग याद है
सर्द सी शाम थी......बस बेजुबान हो जाता हू

आखो का नीला रन्ग िकसी नजूमी की अगूटी है
तैर नही पाता, इसिलये डूब जाता हू

कही और जाना था......

िचन्मय - ०२/०३/०७ justju/wilted_rose.gif

उसने याद िकया...


उसने याद िकया...

आज िफर आधी आई
उड गया मेरा फटा कुर्ता
क्या पहनूगा कल
सवाल सामने है कैसे िनकलूगा कल


जाना था बहुत दूर
िकसी ने याद िकया
जेब खाली
पेट खाली
टूटी साइिकल का ट्यूब खाली
लेिकन.....
िकसी ने तार िदया
भले ही शादी के बहाने
कम से कम
उसने याद िकया....

िचन्मय - ०१/०३/०७

घनी छाव मे....


घनी छाव मे....

तेरी पलको की घनी छाव मे बैटः,
पल भर को सोचता हू
देखता हू
कुछ रुइ के पन्ख तुम्हारे बालो मे उलझ गये है।

सासो से उटःती श्राबी गन्ध
आखो से उटःता धुआ
लगता है
झील कोहरे मे कुछ िछपा रही है,

भीग गये है खत
कुछ दाग बचे है
कहा है नाम तेरा.....

देखता हू
इक इबारत
तेरी हाथ की मेहदी मे घुली हुइ
मेरी डायरी के पन्नो मे मुस्कुरा रही है
और मै
सुस्ता रहा हू
तेरी पलको की घनी छाव मे.....

िचन्मय - २६/०६/०७